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Family Values

मन लागे ना ससुरवा में मोर

— राम बहादुर अधीर पिण्डवी

याद जब आवेला बाबा के दुअरवा, अँखिया में भरि जाला लोर।

हो मन लागे ना ससुरवा में मोर ।।......

जनम करम जहाँ पवनी सनेहिया। बिसरे ना एको पल बाबूजी के नेहिया ।।

मइया के रहनी हम बहुते दुलरुई, घरवा के रहनी अँजोर ।। हो मन........

भउजी हमार कहि बबुनी बोलावे। भइया हमार नाही हमे बिसरावे ।।

बाबू जी की अँखिया के रहनी पुतरिया, छोड़ि अइनी होत सबके भोर ।।........

सखियन के साथ छूटल बाबा के अंगनवां। हो गइल सब कुछु अब तऽ सपनवां ।।

निमिया के छहियां बिसारे नाही बिसरे, मनवा के देला झकझोर ।। हो..........

डोलिया ले अइने जब दुअरा कहरवा । तानि दिहने ऊपरा से ललका ओहरवा ।।

भउजी ढकेलि डोलिया बइठवली, हमरो चले ना कवनो जोर ।। हो