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Romance & Longing

खिड़िकिया से झाँकेला

— राम बहादुर अधीर पिण्डवी

केहू चान जइसे आके खिड़िकिया से, जब रतिया ढलेला तऽ झाँकेला।

हमरी सोरहो सिंगार के किताब जइसे, खड़ा होके खिड़िकिया से बाँचेला ।।..........

काहें घात केहू हम पर लगवले बा। मुंहवा खिड़िकी की पिछवा चोरवले बा ।।

नाहीं बोलेला कुछ, भेद खोले ना कुछ, काहें तिरछी नजरिया से ताकेला ।।........

केहू दूसर हवे कि सजना हमार। कि झूठ-मूठ के कवनो सपना हमार ।।

होला मन परेशान, जब छुपि जाला चान, धन हमरी जवनिया के जाँचेला ।।.......

आजु फिरु काहे हमके भरम हो गइल। नीद टूटल ना अइसन करम हो गइल ।।

रूठि गइने पिया, नाहीं अइने पिया, कि हमरी पिरितिया केहू आँजेला ।।.......