Village Life
कबले अइबऽ शहरिया से
— राम बहादुर अधीर पिण्डवी
शहरिया से हो, शहरिया से, कबले अइबऽ मोर बलमुआ शहरिया से ।।.......
खेती किसानी के समय अब आइल। बुढ़वा बएल रहे ऊहो बिकाइल ।।
कवनो तरे अबकी खेतवा बोवाइल, कइसे पानी चली अबकी नहरिया से ।। कबले......
मुनुआ सेयान भइल पढ़े अब जाई। कापी किताब पेन कइसे किनाई ।।
गुड़िया के फीस बिनु छूटल पढ़ाई, कवनो सुखवा नइखे तोहरी नोकरिया से ।। कबले.....
अम्मा जी के साड़ी बाबू जी के मरदानी। हमरो के चाहीं एगो साड़ी रंग धानी ।।
धानी ना मिली तऽ ले अइहऽ असमानी, ऊहो लेले अइहऽ पटना बजरिया से ।। कबले.......
बाति-बाति के इहाँ बाटे परेशानी। साँच सब लिखीं हम, झूठ जनि जानीं ।।
घर में मेहमान आइल तोहरे निसानी, अनजा चूकि गइल सगरो बखरिया से ।।........
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सुधार नइखे
हमरी गउवां में तनिको सुधार नइखे । भाई-भाई में लड़ाई होला प्यार नइखे ।। पहिले के लोग सब एक में रहत रहे। मनवा के बाति सभे सबसे कहत रहे ।।
खिल उठे मनवा उदास
चढ़ते असढ़वा बरसे बदरवा, कि धरती के बूझेला पियासि । बड़ा नीक लागे हरियर दुबिया, खिलि उठे मनवा उदास ।।.......
शहरिया से गाँव हो
दुअरा पर निमिया के घन बाटे छाँव हो। बड़ा नीक लागेला शहरिया से गाँव हो ।। मंगरू भगत लागें गाँव भर के काका। बचनू कँहार लागें बुढ़वन के दादा ।।