पिपरा कहेला मन के बतिया
बरगद से पिपरा कहेला मन के बतिया। कुछ दिन के जिनगी के संग बा संघतिया ।।
गउवां में अपनी धरम घटि गइल। घर-घर में चउका आँगन बंटि गइल ।।
आपसी विवाद में खेतवा बटाइल । केहू के मन में सरम ना आइल ।।
भाई-भाई रहे ना अब एक मतिया। कुछु दिन के जिनगी के संग बा संघतिया ।।
गाँव भर की लोगवा के बेनिया डोलाईं। राही-बटोहिया के सुख पहुंचाईं ।।
केकर बड़ाई करीं केकर हिनाई। एक दूसरे में होला झगड़ा लड़ाई ।।
नाही बाटे पहिले सा केहू में पिरितिया। कुछ दिन के जिनगी के संग बा संघतिया ।।
गाँँव की लड़िकन के झुलुआ झुलाई। खेलत कुदत देखि बड़ी हरसाईं ।।
हमरो पर लोगवा नजरिया गड़ावेला। धीरे-धीरे अमवा महुअवा कटावेला ।।
सोचि सोचि निदिया ना आवे दिन रतिया। कुछु दिन के जिनगी के संग बा संघतिया ।।
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लोभ से भरल लोग दहेज के पुजारी। केतने कुंवारि बाड़ी बिटिया बेचारी ।।
चिरइन के रही नाही इहवा बसेरा। गाई ना कोयलिया अब होखते सबेरा ।।
बड़ी दुख होला देखि लवटत बरतिया। कुछु दिन के जिनगी के संग बा संघतिया ।।