Village Life
पठवले बानी पतिया
— राम बहादुर अधीर पिण्डवी
तोहके पठवले बानी लिखि लिखि पतिया। लवटि आव ना, सइयां मानऽ मोर बतिया ।।
सूखि गइल धान, बिनु फुटले कटाइल। खरची के तंगी अब घर में समाइल ।।
काँपी किताब माँगे बेटी रजमतिया, लवटि आव ना, सइयां मानऽ मोर बतिया ।।
पहिरे के कपड़ा ना ओढ़े के रजाई बा। तोहरा के छोड़ि कवन घर में कमाई बा ।।
नइखे बुझात कटी कइसे ई बिपतिया। लवटि आव ना, सइयां मानऽ मोर बतिया ।।
जवन कमइलऽ उहे लेके चलि आवऽ। घरे आके टूटही मड़इया तू छवावऽ ।।
बरखा में होई अबकी रहे के ससतिया, लवटि आव ना, सइयां मानऽ मोर बतिया ।।
गाँव की सड़किया पर माटी फेंकाता। गउवां के लोग मजदूरी करे जाता ।।
इहवें गुजारा होई जो करबऽ मेहनतिया, लवटि आव ना, सइयां मानऽ मोर बतिया ।।
चारि महीना बीतल गर्मी के दिनवां । कवनो तरे बीति गइल के भादो महिनवां ।।
जाड़ा के कटी कइसे बिनु तोहरी रतिया, लवटि आव ना, सइयां मानऽ मोर बतिया ।।
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