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Village Life

दहेज के बिमारी

— राम बहादुर अधीर पिण्डवी

धन दीह तबे प्रभु बेटी दीहऽ, कवनो बेटी के बाप गरीब न दीह।

जेकरी मन में हो दहेज के लोभ, हे नाथ ओके धन कबो न दीह ।।

लक्ष्मी के तऽ रूप हई बिटिया, अँखिया में कबो तूं आँसू न दीह।

निर्धन के भी संग जो व्याह रचे, लक्ष्मी के उहाँ सथवे भेजि दीह ।।

धीरे-धीरे बढ़ि गइल दहेज के बिमारी। कुंवारि रहेली बेटी केतने बेचारी ।।

छोट बड़ सब पर दहेज के असर बा। गाँव देहात नाहीं बचल शहर बा ।।

फेल कानून बाटे सब सरकारी ।। कुंवारि........

रंग, रूप, गुन, ढंग सगरी खोजाता। बाप धनवान लड़की वाला जोहाता ।।

लड़िका शराबी चाहे होखे जुआरी ।। कुंवारि...........

वाशिंग मशीन, टी.वी, फ्रीज, अलमारी। हीरो होंडा गाड़ी चाही उनकी दुआरी ।।

बिना एकरी मारल जइहे लड़की बेचारी। कुंवारि..........

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कोढ़ बा समाज में दहेज बड़ी भारी। नइखे बुझात मिटी कइसे ई बिमारी ।।

सब पर असर ई करेला बारी-बारी ।। कुंवारि........

अपनी लड़कियन के खूबे पढ़ाईं। पढ़ा लिखा के ओके आगे बढ़ाई ।।

लड़िकन के पारा गिरी बढ़ी जब बेकारी ।। कुंवारि.......